हमारे राष्ट्रीय आदर्श

 हमारे राष्ट्रीय आदर्श 

हमारे राष्ट्रीय आदर्श

भारतवर्ष लंबी गुलामी के बाद 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्र हुआ। स्वतंत्रता के पश्चात् यह कंकालरूपी मानव की ढाँचा की तरह था। जो गरीबी, अशिक्षा, बर्बाद उद्योग धंधे, असमान अन्याय पर आधारित सामाजिक व्यवस्था तथा अन्य अनेक समस्याओं से घिरा हुआ था। स्वतंत्रता प्राप्ति का उद्देश्य सिर्फ सत्ता ही नहीं बल्कि इन समस्याओं से छुटकारा पाना भी था जिससे कि राष्ट्र के समक्ष ऊँचे आदर्श की प्राप्ति हो तथा आर्थिक स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व की भावना का विकास भी हो। इसके लिए राष्ट्रीय अखंडता, लोकतंत्र, समाजवाद और धर्म निरपेक्षता का आधार बनाना आवश्यक था।


राष्ट्रीय अखण्डता

लंबी लड़ाई, हिंसक और अहिंसक आंदोलन से गुजरते हुए अंततः भारत 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्र हुआ। स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही भारतवासियों पर एक नई जिम्मेदारी राष्ट्रीय अखण्डता को बनाये रखने की आ गई। देश की सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय अखंडता की रक्षा काफ़ी आवश्यक हो गया। इसके लिए आवश्यक था कि देशी रियासतों जो कि 500 से भी अधिक थी, का भारत में विलय कर दिया जाय। इस कार्य में उस समय के गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने काफी प्रशनीय कार्य किया। उन्होंने देशी रियासतों को भारत में विलय कर देश का अभिन्न अंग बना दिया। जो स्वेच्छा से नहीं मिलना चाहते थे बल प्रयोग द्वारा उनका विलय कर दिया गया। संविधान सभा में संविधान का उद्देश्य प्रस्ताव रखते हुए जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि न्याय तथा सभ्य राष्ट्रों के कानूनों के अनुसार भारत राज्य क्षेत्र की अखंडता की रक्षा का प्रबंध किया जाएगा। 1976 ई० के 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम में संविधान की प्रस्तावना में राष्ट्रीय एकता के साथ अखंडता शब्द भी जोड़ दिया गया। आज की परिस्थितियों में ऐसा महसूस होता है कि भारत की अखंडता को बर्बाद करने के लिए राष्ट्रीय एकता को समाप्त करने के लिए विदेशी ताकतें प्रयत्नशील हैं जिसके परिणामस्वरूप जहाँ-तहाँ आतंकवाद की काली छाया मंडराती रहती है। राष्ट्रीय अखंडता और एकता को कायम रखने के लिए सम्पूर्ण भारतवासियों को ऐसे तत्त्वों पर कड़ी निगरानी रखनी होगी तथा ऐसे तत्त्वों को हटाना होगा जिससे राष्ट्रीय अखंडता को खतरा हो जाय। अलगाववादिता, सांप्रदायिकता, जातीयता, धर्मांधता, क्षेत्रीयता आदि राष्ट्रीय खंड के ही राष्ट्रीय अखंडता की रक्षा की जा सकती है।

लोकतंत्र

भारत में लोकतांत्रिक या प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था कायम की गई है। संविधान के प्रस्तावना में भी यह वर्णित है कि भारत एक लोकतांत्रिक राज्य है। लोक निर्णय ही लोकतंत्र का आधार होता है। स्वतंत्रता, भ्रातृत्व, समानता के अलावे विधि का शासन, जागरूकता, स्वतंत्र जनमत, शिक्षा आदि भी लोकतंत्र के प्रमुख आधार हैं। लोकतंत्र में शासन जनता के जनप्रतिनिधि के हाथों में ही होता है। लोकतंत्र भी दो प्रकार का होता है। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लोकतंत्र प्रत्यक्ष लोकतंत्र में जनता प्रत्यक्ष रूप से शासन कार्य में भाग लेती है जब कि अप्रत्यक्ष लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधियों द्वारा शासन में भाग लेती है।

भारत में लोकतंत्रात्मक शासन पद्धति स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अब तक 1975 ई० के आपात स्थिति को छोड़कर निर्वाध रूप से और सफलतापूर्वक चल रहा है। हालांकि यहाँ लोकतंत्र के मार्ग में अशिक्षा, असमानता, गरीबी, नागरिक गुणों का अभाव, मतदान का दुरुपयोग जैसी बाधाएँ हैं। परन्तु इन बाधाओं को दूर करने के लिए आवश्यक कदम उठाये जा रहे हैं। सम्पूर्ण साक्षरता और रोजगार के भी कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं निष्पक्ष चुनावों के लिए भी तरीके अपनाये जा रहे हैं। भारत विश्व का सबसे बड़ा और सफल लोकतांत्रिक गणराज्य बन चुका है। भारतीय चुनाव में  पहचान-पत्र के माध्यम से वोट डालने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। उस समय के चुनाव आयुक्त टी. एन. शेषण का इसमें बहुत बड़ा योगदान रहा था।

सामाजिक समानता लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में जनता के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए संविधान में मौलिक अधिकार की घोषणा की गयी है। भारतीय संविधान के तीसरे अध्याय में मौलिक अधिकारों का वर्णन किया गया है। नागरिक ही जनतंत्र का आधार है अतएव नागरिक के व्यक्तित्व को विकसित करने के लिए मूल अधिकारों की घोषणा आवश्यक है। यही वजह है कि भारतीय संविधान में समता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता की अधिकार, संस्कृति तथा शिक्षा सम्बन्धी अधिकार, सम्पत्ति का अधिकार (जो  संविधान के 44 संशोधन द्वारा समाप्त किया गया है) और संवैधानिक उपचारों के अधिकार का वर्णन किया गया है। इन अधिकारों के बल पर ही देश का कोई भी व्यक्ति उच्चतम पद पर पहुँचकर अपना तथा राष्ट्र के मान-मर्यादा को बढ़ा सकता है। अनुच्छेद 12 से लेकर 35 तक में वर्णित मूल अधिकार नागरिकों के निष्पक्ष न्याय का सूचक है। स्वतंत्र भारत में धर्म, मूलवंश, जाति लिंग या जन्म स्थान के आधार पर किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं किया जा सकता है। अस्पृश्यता का अन्त कर उन्हें भाषण की स्वतंत्रता प्रदान की गयी है। जाति-प्रथा, छुआछूत, ऊँच-नीच के भाव को समाप्त कर दिया गया। मजदूरों को शोषण से मुक्त कर दिया गया है। आज के वर्त्तमान परिवेश में मंडल कमीशन के सिद्धान्त को सरकारी नौकरियों में 27% का आरक्षण पिछड़ी जातियों को दिया गया है। कुछ राज्यों में इसकी सीमा और भी अधिक बढ़ाने की बात चल रही है। डा० अम्बेदकर का 'सामाजिक न्याय' का सिद्धान्त भी वर्तमान समाज के बदलते परिवेश में काफी महत्त्वपूर्ण हो गया है। आदिवासी एवं हरिजनों के लिए लोकसभा एवं विधानसभाओं में 25% सीटें आरक्षित की गयी हैं। सरकारी नौकरियों में भी उन्हें आरक्षण की व्यवस्था है। इस प्रकार आज नेहरू एवं गाँधी के सपनों का भारत विकास की मंजिलों को पार करता हुआ आगे की ओर बढ़ रहा है।

राजनीतिक समता—

 जनतंत्र जनता का है, जनता के लिए है और जनता द्वारा संचालित शासन है। इस प्रकार भारतीय संविधान में वर्णित भारत की शासन व्यवस्था का जो रूप है उसमें सर्वप्रथम प्रस्तावना का वर्णन मिलता है, जिसके अन्तर्गत भारतीय संविधान की अन्तरात्मा न्याय, समता अधिकार और बन्धुत्व से परिपूर्ण हैं। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय हमारे वर्तमान संविधान की विशेषता है। बाद में चलकर भारतीय क्षेत्र का विषद वर्णन मिलता है। भारत का हर क्षेत्र संघ के लिए बराबरी का महत्त्व रखता है। इस प्रकार प्रस्तावना हमें यह भी शिक्षा देता है कि हम क्या करेंगे, हमारा ध्येय क्या है और हम किस दिशा में जा रहे हैं। इस प्रकार प्रस्तावना तो सम्पूर्ण संविधान की आत्मा है। प्रस्तावना का एक-एक शब्द तपस्या, त्याग और बलिदान की कहानी कहता है।

एकहरी नागरिकता एवं वयस्क मताधिकार -

जनता ही जनतंत्र की आधारशिला है। 18 वर्ष के भारत के समस्त नागरिक को वयस्क मताधिकार प्राप्त है। बशर्ते कि वह पागल, दिवालिया एवं भयंकर अपराध का अपराधी न हो। भारत विश्व का सबसे बड़ा जनतंत्र है। अतएव यहाँ के नागरिक प्रत्यक्ष ढंग से अपने प्रतिनिधियों को निर्वाचित करके शासन व्यवस्था को संचालित करता है। भारतीय शासन व्यवस्था में नागरिकों को यह अधिकार देकर राजनीतिक समानता के सिद्धान्त की पुष्टि की गयी है। हमारे यहाँ एकहरी नागरिकता की व्यवस्था है। देश के किसी भाग का नागरिक लोकसभा या राज्यसभा के चुनाव में किसी भी जगह से चुनाव लड़ सकता है। यह व्यवस्था इसलिए की गयी है कि सम्पूर्ण भारत को वह अपना घर समझे। भारत में चुनाव को निष्पक्ष बनाने की दिशा में चुनाव आयोग के अध्यक्ष श्री टी०एन० के समय शेषण द्वारा मतदाताओं के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए परिचय पत्र की व्यवस्था की गयी ताकि भारत लोकतंत्र की जड़ें और भी मजबूत हो सके।

समाजवाद

वर्तमान युग समाजवाद का युग कहलाता है। समाजवाद सामाजिक शोषण के अन्त तथा सभी क्षेत्रों में न्याय व्यवस्था की स्थापना का समर्थक है। भारत ने भी अपनी आर्थिक विपन्नता और समस्याओं को दूर करने के लिए समाजवाद को अपनाया।

यद्यपि समाजवाद का विचार बहुत पुराना है। प्लेटो ने भी का रूप प्रस्तुत किया है। अनेक राजनीतिक विद्वानों ने इसकी परिभाषा प्रस्तुत की है। सेलर्स ने कहा है कि "समाजवाद एक जनतंत्रात्मक आंदोलन है, जिसका उद्देश्य समाज का एक ऐसा आर्थिक संगठन करना है, जो एक समय में, एक साथ अधिकार न्याय और स्वतंत्रता दे सके।" रैम्जे मैकडोनाल्ड के अनुसार- "साधारण भाषा में समाजवाद की इससे अच्छी कोई परिभाषा ही नहीं दी जा सकती कि इसका उद्देश्य समाज के भौतिक तथा आर्थिक तत्त्वों का संगठन और मानवीय शक्तियों द्वारा इसका नियंत्रण है।"

निष्कर्षतः 

यह कहा जा सकता है कि समाजवादी राज्य में अधिकाधिक सामाजिक हित और कल्याण निहित है। इसका उद्देश्य वैयक्तिक न होकर सामाजिक होता है। समाजवादी राज्य में ही विषमता, वर्ग संघर्ष और भेद-भाव का अंत संभव है।

भारत को ऐसे ही राज्य व्यवस्था की आवश्यकता है। यहाँ वर्ग विषमता और असमानता अधिकाधिक रूप में विद्यमान थी। राज्य के नीति निर्देशक तत्त्वों में भी कुछ ऐसे सिद्धान्त हैं जो समाजवाद के मार्ग को प्रशस्त करते हैं। संविधान के 42 वें संशोधन में समाजवादी शब्द को जोड़कर और भी स्पष्ट कर दिया गया है। संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों से हटाकर समाजवादी राज्य की धारणा को और भी अधिक सुदृढ़ता प्रदान की गई है। इसी उद्देश्य से कई कार्यक्रम जैसे- 20-सूत्री योजना, रोजगार योजना भी चलाए जा रहे हैं। अतः यह स्पष्ट है कि भारत में लोकतांत्रिक समाजवाद की स्थापना की गई हैं।

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